हिंदी के कलावादी-रूपवादी लेखक अशोक वाजपेयी (जन्म 1941) भी केंद्र में सत्तारूढ़ हिंदुत्व फ़ासीवादियों, हत्यारों और अपराधी समूहों के गैंग में खुल्लमखुल्ला शामिल हो गये हैं।
ज़्यादा समय नहीं बीता, उनके पहले, हिंदी के एक अन्य कलावादी-रूपवादी लेखक विनोद कुमार शुक्ल (1937-2025) हिंदुत्व फ़ासीवादियों और हत्यारों के साथ क़दमताल करते नज़र आये थे। (संदर्भः रायपुर हिंद युग्म उत्सव-2025)
फ़र्क सिर्फ इतना है कि विनोद कुमार शुक्ल ने जहां यह शर्मनाक काम बिना भोंपूबाज़ी के किया, वहीं अशोक वाजपेयी ने दिल्ली में 18 सितंबर 2026 को यह अत्यंत निंदनीय काम अपने निर्लज्ज बड़बोलेपन और निरर्थक शब्दों की पाखंडपूर्ण बाजीगिरी के साथ किया। उन्होंने अपने भाषण में एक बार भी आरएसएस-भाजपा-नरेंद्र मोदी-अमित शाह का जिक्र तक नहीं किया। कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए मैं कहूंगा कि हत्या को भी कला में बदल देने का मनुष्य विरोधी हुनर अशोक वाजपेयी को आता है।
मेरा यह स्पष्ट मानना है कि हिंदी की साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी को, जो अपने को वाम-प्रगतिशील और उदार-सेकुलर कहती है, अशोक वाजपेयी और उनके रज़ा फ़ाउंडेशन का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए।
यह सही है कि 2014 के बाद से, जबसे केंद्र में हिंदुत्व फ़ासीवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, अशोक वाजपेयी असहिष्णुता, नफ़रत और हिंसा के ख़िलाफ आवाज़ उठाते रहे और अपनी असहमति दर्ज करते रहे। लेकिन इसका इस्तेमाल उन्होंने अपना प्रभामंडल बनाने और भाजपा-विरोधी सांस्कृतिक अभियान में अपना नेतृत्व और वर्चस्व स्थापित करने में लगाया। वह वर्ग और वर्ग संघर्ष का बराबर निषेध करते रहे। उन्होंने हिंदी साहित्य में हिंदू सवर्ण सामंती उच्च जाति-आधारित लेखक समूह बनाया।
अशोक वाजपेयी भगतसिंह और अंबेडकर से बराबर परहेज करते रहे हैं। यह सायास रहा है। हिंदू जाति व्यवस्था / वर्ण व्यवस्था का तीखा विरोध / उस पर वैचारिक हमला उन्होंने कभी नहीं किया। वह अपनी ब्राह्मणी पहचान और तथाकथित सनातनी हिंदू श्रेष्ठता बराबर प्रदर्शित करते रहे हैं।
ध्यान देने की बात है कि अशोक वाजपेयी शुरू से ही दक्षिणपंथी, वामपंथ-विरोधी और सत्तापरस्त लेखक रहे हैं। और यह छुपी हुई बात नहीं है। अब उन्होंने खुल कर हिंदुत्व फ़ासीवाद का दामन थाम लिया है। सत्ता संरचनाएं कई तरह की होती हैं और सत्तापरस्ती भी कई तरह की होती है।
दिक्कत यह है कि हिंदी के वाम-प्रगतिशील लेखकों का एक घोर अवसरवादी लेकिन प्रभावशाली धड़ा अशोक वाजपेयी को अपने रहनुमा / सरपरस्त/ गाइड के तौर पर प्रोजेक्ट करता रहा है। इस काम में हिंदी-उर्दू पट्टी के तीनों वामपंथी लेखक संगठन जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ किसी-न-किसी रूप में शामिल रहे हैं।
दिल्ली में 18 सितंबर 2026 को एक सार्वजनिक क्रार्यक्रम में श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट की ओर से श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान-2026 अशोक वाजपेयी को दिया गया। इसके तहत उन्हें 21 लाख रुपये दिये गये।
हिंदी के दिवंगत कवि श्रीकांत वर्मा की स्मृति में उनके बेटे अभिषेक वर्मा ने श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट बनाया है, जिसके तहत श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान अशोक वाजपेयी को दिया गया। अभिषेक वर्मा केंद्र में भाजपा सरकार की सहयोगी पार्टी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के एक प्रमुख नेता हैं और इसके राष्ट्रीय चुनाव संयोजक हैं। 17 सितंबर को नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर उनकी जयकार करते हुए अभिषेक वर्मा ने एक संदेश जारी किया था।
उनकी एक और ‘खासियत’ यह रही है कि वह अतीत में हथियारों के बड़े सौदागर और एजेंट रहे हैं। बड़े सरकारी हथियार ख़रीद में दलाली खाने के गंभीर आरोप उन पर लगे थे। इसके तहत उन्हें गिरफ़्तार करके तिहाड़ जेल (दिल्ली) भेजा गया था। अदालत में आरोप साबित न होने पर वह रिहा हो गये। लेकिन हथियारों की ख़रीद-फ़रोख्त में आशुतोष वर्मा ने बेतहाशा कमाई की। इसी कमाई से श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान दिया गया।
तो ऐसे अभिषेक वर्मा के ट्रस्ट से अशोक वाजपेयी ने 21 लाख रुपये लिये! शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) का हाथ थामकर, लगता है, उन्होंने दूर का निशाना साधा है।
इस कार्यक्रम में कुछ हिंदी लेखक—अरुण कमल, ममता कालिया, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विनोद भारद्वाज, आदि—मौजूद थे। ये सभी अशोक वाजपेयी के लगुए-भगुए हैं—वह जहां कहेंगे, वहां ये पहुंच जायेंगे।
वैसे, यह मानना पड़ेगा कि हिंदी लेखक समाज में अशोक वाजपेयी ने अपने बहुत सारे लगुए-भगुए और चाटुकार पैदा कर दिये हैं, जो दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, बनारस, पटना, भोपाल, रायपुर और अन्य शहरों में फैले हुए हैं। रज़ा फ़ाउंडेशन (अशोक वाजपेयी) की कृपा और दान-दक्षिणा से कई कार्यक्रम (इवेंट) होते या कराये जाते हैं, कई पत्रिकाए (ज्य़ादातर निरर्थक) निकलती हैं, किताबें छपती / छपवाई जाती हैं, और हिंदी के कई प्रकाशकों की दुकानें चलती हैं। इसी के बल पर अशोक वाजपेयी का जलवा बना रहता है और उनका स्तुतिगान चलता रहता है!
(अजय सिंह की टिप्पणी। लेखक कवि और कहानीकार हैं।)